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mahabharat 10.7.41: वह सदैव निर्भय रहता था और भगवान शंकर के क्रोध को सहन कर लेता था। वह प्रतिदिन इच्छानुसार कार्य कर सकता था और तीनों लोकों के देवताओं पर भी शासन कर सकता था। 41॥   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  10.7.41 
ये च वीतभया नित्यं हरस्य भ्रुकुटीसहा:।
कामकारकरा नित्यं त्रैलोक्यस्येश्वरेश्वरा:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
वह सदैव निर्भय रहता था और भगवान शंकर के क्रोध को सहन कर लेता था। वह प्रतिदिन इच्छानुसार कार्य कर सकता था और तीनों लोकों के देवताओं पर भी शासन कर सकता था। 41॥
 
He was always fearless and tolerated Lord Shankar's frown. He could work as per his wish every day and could even rule over the gods of the three worlds. 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)