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mahabharat 10.7.35: वे उन्मत्त हाथियों की तरह बार-बार दहाड़ रहे थे। उनके हाथों में भाले और करधनी दिखाई दे रही थी। वे देखने में भयंकर और डरावने लग रहे थे। 35.   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.7.35 
मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहु:।
सुभीमा घोररूपाश्च शूलपट्टिशपाणय:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वे उन्मत्त हाथियों की तरह बार-बार दहाड़ रहे थे। उनके हाथों में भाले और करधनी दिखाई दे रही थी। वे देखने में भयंकर और डरावने लग रहे थे। 35.
 
They roared repeatedly like mad elephants. Spears and belts were visible in their hands. They were fierce in appearance and terrifying. 35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)