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mahabharat 10.7.23: राजेन्द्र! उनके बाल भी अग्नि की ज्वाला के समान प्रतीत हो रहे थे। उनके शरीर का प्रत्येक रोम जल रहा था। उन सभी की चार भुजाएँ थीं। हे मनुष्यों के स्वामी! उनमें से अनेकों के मुख भेड़-बकरियों के समान थे।   |   mahabharat अध्याय 10.7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 7: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.7.23 
ज्वालाकेशाश्च राजेन्द्र ज्वलद्रोमचतुर्भुजा:।
मेषवक्त्रास्तथैवान्ये तथा छागमुखा नृप॥ २३॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उनके बाल भी अग्नि की ज्वाला के समान प्रतीत हो रहे थे। उनके शरीर का प्रत्येक रोम जल रहा था। उन सभी की चार भुजाएँ थीं। हे मनुष्यों के स्वामी! उनमें से अनेकों के मुख भेड़-बकरियों के समान थे।
 
Rajendra! Their hairs also appeared like flames of fire. Every hair on their body was burning. They all had four arms. O Lord of men! The faces of many of them were like those of sheep and goats.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)