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mahabharat 10.6.8: उसके मुख, दोनों नासिका, कान और हजारों नेत्रों से अग्नि की बड़ी-बड़ी ज्वालाएँ निकल रही थीं ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 10.6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  10.6.8 
तस्यास्यान्नासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वश:।
तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्य: प्रादुरासन् महार्चिष:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उसके मुख, दोनों नासिका, कान और हजारों नेत्रों से अग्नि की बड़ी-बड़ी ज्वालाएँ निकल रही थीं ॥8॥
 
Huge flames of fire were coming out from his mouth, both nostrils, ears and thousands of eyes. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)