श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  10.6.7 
नैव तस्य वपु: शक्यं प्रवक्तुं वेष एव च।
सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वता:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उसके शरीर और वेश का वर्णन नहीं किया जा सकता। उसे पूर्ण रूप से देखकर पर्वत भी भय से फट जाते थे ॥7॥
 
His body and attire cannot be described. Even mountains could be torn apart out of fear upon seeing him fully. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)