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mahabharat 10.6.33-34: भगवान शंकर तप और पराक्रम में सब देवताओं से श्रेष्ठ हैं; इसलिए मैं उनकी शरण लेता हूँ, जो रोगों और शोकों से रहित हैं, जटाओं वाले हैं, देवताओं के भी देव हैं, देवी उमा के प्रिय हैं, मुंडों की माला धारण करते हैं, भगवान की कुदृष्टि को हरने वाले हैं, पापों का नाश करने वाले हैं, त्रिशूल धारण करने वाले हैं और पर्वत पर शयन करने वाले रुद्रदेव हैं।॥33-34॥   |   mahabharat अध्याय 10.6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  10.6.33-34 
कपर्दिनं देवदेवमुमापतिमनामयम्॥ ३३॥
कपालमालिनं रुद्रं भगनेत्रहरं हरम्।
स हि देवोऽत्यगाद् देवांस्तपसा विक्रमेण च।
तस्माच्छरणमभ्येमि गिरिशं शूलपाणिनम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
भगवान शंकर तप और पराक्रम में सब देवताओं से श्रेष्ठ हैं; इसलिए मैं उनकी शरण लेता हूँ, जो रोगों और शोकों से रहित हैं, जटाओं वाले हैं, देवताओं के भी देव हैं, देवी उमा के प्रिय हैं, मुंडों की माला धारण करते हैं, भगवान की कुदृष्टि को हरने वाले हैं, पापों का नाश करने वाले हैं, त्रिशूल धारण करने वाले हैं और पर्वत पर शयन करने वाले रुद्रदेव हैं।॥33-34॥
 
Lord Shankar is superior to all gods in austerity and valour; therefore, I seek refuge in him, who is free from diseases and sorrows, has matted hair, is the God of gods, the beloved of Goddess Uma, wears a garland of skulls, destroys the evil eyes of Bhagwan, destroys sins, holds a trident and Rudradev who sleeps on the mountain.'॥ 33-34॥
 
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिचिन्तायां षष्ठोऽध्याय:॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी चिन्ताविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ॥ ६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)