श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  10.6.32-33h 
नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक्यं कथंचन।
सोऽहमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं विभुम्॥ ३२॥
दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशयिष्यति।
 
 
अनुवाद
भगवान की कृपा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, जिससे किसी प्रकार यहाँ पुनः युद्ध-संबंधी प्रयास हो सकें; अतः आज मैं सर्वव्यापी भगवान महादेवजी की शरण लेता हूँ। वे ही मेरे सामने आए इस दैवी दण्ड को नष्ट करेंगे।'
 
‘There is no other way except the favour of the divine, by which somehow the war related efforts can be made here again; therefore today I take refuge in the omnipresent Lord Mahadevji. Only he will destroy this terrible punishment of the divine which has come in front of me. 32 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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