श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  10.6.30-31 
न चैतदभिजानामि चिन्तयन्नपि सर्वथा।
ध्रुवं येयमधर्मे मे प्रवृत्ता कलुषा मति:॥ ३०॥
तस्या: फलमिदं घोरं प्रतिघाताय कल्पते।
तदिदं दैवविहितं मम संख्ये निवर्तनम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
सब प्रकार से विचार करने पर भी मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि यह कौन है । निश्चय ही मेरा यह कलुषित मन पापकर्मों में प्रवृत्त हो गया है; उसी का नाश करने के लिए यह भयंकर परिणाम आया है । अतः आज युद्ध से मेरा पीछे हटना ईश्वर के विधान से ही संभव हुआ है ॥30-31॥
 
‘Even after thinking and contemplating in every possible way, I am unable to understand who this is. Surely, this tainted mind of mine has been inclined towards wrongdoings; this terrible consequence has come to destroy that. Therefore, my retreat from the battle today has been possible only by the law of God.॥ 30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)