Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 10.6.28-29: यह भय मेरे ही कुकर्मों के कारण मुझ पर आ पड़ा है। द्रोणाचार्यपुत्र तो किसी भी प्रकार युद्ध से पीछे नहीं हट सकता; परन्तु मैं क्या करूँ, यह महान् तत्त्व मेरे मार्ग में बाधा डालने के लिए दैवी दण्ड के समान उठ खड़ा हुआ है॥ 28-29॥ | mahabharat अध्याय 10.6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना । mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम्॥ २८॥
न हि द्रोणसुत: संख्ये निवर्तेत कथंचन।
इदं च सुमहद् भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम्॥ २९॥
अनुवाद
यह भय मेरे ही कुकर्मों के कारण मुझ पर आ पड़ा है। द्रोणाचार्यपुत्र तो किसी भी प्रकार युद्ध से पीछे नहीं हट सकता; परन्तु मैं क्या करूँ, यह महान् तत्त्व मेरे मार्ग में बाधा डालने के लिए दैवी दण्ड के समान उठ खड़ा हुआ है॥ 28-29॥
This fear has come upon me due to my own misdeeds. Dronacharya's son cannot retreat from the battle in any way; but what can I do, this great element has risen like a divine punishment to obstruct my path.॥ 28-29॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥