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श्लोक 10.6.28-29  |
तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम्॥ २८॥
न हि द्रोणसुत: संख्ये निवर्तेत कथंचन।
इदं च सुमहद् भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| यह भय मेरे ही कुकर्मों के कारण मुझ पर आ पड़ा है। द्रोणाचार्यपुत्र तो किसी भी प्रकार युद्ध से पीछे नहीं हट सकता; परन्तु मैं क्या करूँ, यह महान् तत्त्व मेरे मार्ग में बाधा डालने के लिए दैवी दण्ड के समान उठ खड़ा हुआ है॥ 28-29॥ |
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| This fear has come upon me due to my own misdeeds. Dronacharya's son cannot retreat from the battle in any way; but what can I do, this great element has risen like a divine punishment to obstruct my path.॥ 28-29॥ |
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