श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  10.6.24-25 
तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिण:॥ २४॥
यदुद्यम्य महत् कृत्यं भयादपि निवर्तते।
अशक्तश्चैव तत् कर्तुं कर्म शक्तिबलादिह॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘जब मनुष्य कोई महान् कार्य आरम्भ करके भय के कारण उससे पीछे हट जाता है और बलपूर्वक भी उस कार्य को करने में असमर्थ हो जाता है, तब बुद्धिमान पुरुष उसे सबसे गंभीर समस्या कहते हैं ॥ 24-25॥
 
‘Wise men call it the most serious problem when a man, after starting a great task, retreats from it out of fear and becomes incapable of carrying out that task even by force.॥ 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)