श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  10.6.23-24h 
इत्येवं गुरुभि: पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा।
सोऽहमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदिष्टं सनातनम्॥ २३॥
अमार्गेणैवमारभ्य घोरामापदमागत:।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार गुरुजनों ने सब मनुष्यों को सदा से यही उपदेश दिया है। परंतु मैं उस शास्त्र-विहित सनातन मार्ग का उल्लंघन करके, मार्ग से हटकर चलकर तथा इस अनुचित कर्म का आरम्भ करके भयंकर संकट में पड़ गया हूँ॥ 23 1/2॥
 
‘In this way, the Gurus have already taught this to all people forever. But I have fallen into a terrible problem by violating that eternal path prescribed by the scriptures, by walking without the path and by starting this inappropriate action.॥ 23 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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