श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 19-20h
 
 
श्लोक  10.6.19-20h 
ब्रुवतामप्रियं पथ्यं सुहृदां न शृणोति य:॥ १९॥
स शोचत्यापदं प्राप्य यथाहमतिवर्त्य तौ।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अप्रिय किन्तु हितकर वचन बोलने वाले अपने मित्रों की सलाह नहीं सुनता, वह विपत्ति में उसी प्रकार दुःखी होता है, जैसे मैं अपने उन दो मित्रों की आज्ञा न मानने के कारण दुःखी हो रहा हूँ।
 
A man who does not listen to the advice of his friends who speak unpleasant but beneficial words, grieves in adversity in the same way as I am suffering because of disobeying the orders of those two friends of mine.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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