श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  10.6.18-19h 
तदद्भुततमं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रो निरायुध:॥ १८॥
अब्रवीदतिसंतप्त: कृपवाक्यमनुस्मरन्।
 
 
अनुवाद
यह आश्चर्यमय दृश्य देखकर शस्त्रहीन अश्वत्थामा अत्यंत व्याकुल हो गया और बार-बार कृपाचार्य के वचनों का स्मरण करके मन-ही-मन कहने लगा -॥18 1/2॥
 
Seeing this astonishing sight, the weaponless Ashwatthama became extremely agitated and kept remembering the words of Kripacharya again and again and started saying to himself -॥18 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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