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श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  10.6.17-18h 
तत: सर्वायुधाभावे वीक्षमाणस्ततस्तत:॥ १७॥
अपश्यत् कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनै:।
 
 
अनुवाद
जब उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गए, तब उसने चारों ओर देखना आरम्भ किया। उस समय उसे समस्त आकाश असंख्य विष्णुओं से भरा हुआ दिखाई दिया।
 
When all his weapons were exhausted, he started looking around. At that time, he saw the entire sky filled with innumerable Vishnus.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)