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mahabharat 10.6.14-15h: तब अश्वत्थामा ने तुरन्त ही अपनी दिव्य तलवार म्यान से निकाली, जो स्वर्ण मूठ से सुसज्जित थी और आकाश के समान चमक रही थी, मानो किसी प्रज्वलित सर्प को उसके बिल से बाहर निकाल लिया गया हो।   |   mahabharat अध्याय 10.6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  10.6.14-15h 
अथ हेमत्सरुं दिव्यं खड्गमाकाशवर्चसम्॥ १४॥
कोशात् समुद्‍बबर्हाशु बिलाद् दीप्तमिवोरगम्।
 
 
अनुवाद
तब अश्वत्थामा ने तुरन्त ही अपनी दिव्य तलवार म्यान से निकाली, जो स्वर्ण मूठ से सुसज्जित थी और आकाश के समान चमक रही थी, मानो किसी प्रज्वलित सर्प को उसके बिल से बाहर निकाल लिया गया हो।
 
Then Ashvatthama immediately drew out from its sheath his divine sword, adorned with a golden hilt and shining as bright as the sky, as if a blazing serpent had been pulled out from its hole.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)