श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 6: अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  10.6.11 
द्रौणिमुक्तान् शरांस्तांस्तु तद् भूतं महदग्रसत्।
उदधेरिव वार्योघान् पावको वडवामुख:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जिस प्रकार अग्नि की महान् अग्नि समुद्र के जल को पी जाती है, उसी प्रकार उस महान् आत्मा ने अश्वत्थामा के छोड़े हुए समस्त बाणों को पी लिया।
 
But just as the great fire of fire drinks up the water of the ocean, in the same manner that great soul swallowed up all the arrows shot by Ashvatthama.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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