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mahabharat 10.5.2: इसी प्रकार जो मनुष्य बुद्धिमान होकर भी विनम्रता नहीं सीखता, वह धर्म और अर्थ के निर्णय को तनिक भी नहीं समझ पाता।॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 10.5: अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 5: अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.5.2 
तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते।
न च किंचन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चयम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार जो मनुष्य बुद्धिमान होकर भी विनम्रता नहीं सीखता, वह धर्म और अर्थ के निर्णय को तनिक भी नहीं समझ पाता।॥ 2॥
 
Similarly, a person who, despite being intelligent, does not learn humility, is unable to understand even a little about the decisions of Dharma (righteousness) and Artha (wealth).॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)