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mahabharat 10.4.32: इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, उसे मैं स्वयं भी नहीं रोक सकता। मुझे इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं दिखाई देता जो मुझे क्रोध से दूर कर सके।   |   mahabharat अध्याय 10.4: कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 4: कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.4.32 
न चापि शक्त: संयन्तुं कोपमेतं समुत्थितम्।
तं न पश्यामि लोकेऽस्मिन् यो मां कोपान्निवर्तयेत्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, उसे मैं स्वयं भी नहीं रोक सकता। मुझे इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं दिखाई देता जो मुझे क्रोध से दूर कर सके।
 
The anger that has arisen at this moment, even I myself cannot stop it. I do not see any person in this world who can take me away from anger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)