Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 10.4.29-30: मेरे जीते जी मेरे मित्रों का पराभव मेरे दुःख को उसी प्रकार बढ़ा रहा है जैसे जल का वेग समुद्र को बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही बात पर लगा हुआ है, फिर मैं कैसे सोऊँ और कैसे सुख पाऊँ? | mahabharat अध्याय 10.4: कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना । mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यश्चायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जित:॥ २९॥
शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम्।
एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुत: सुखम्॥ ३०॥
अनुवाद
मेरे जीते जी मेरे मित्रों का पराभव मेरे दुःख को उसी प्रकार बढ़ा रहा है जैसे जल का वेग समुद्र को बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही बात पर लगा हुआ है, फिर मैं कैसे सोऊँ और कैसे सुख पाऊँ?
‘The defeat of my friends while I am still alive is increasing my sorrow in the same way as the speed of water increases the sea. Today my mind is focused on one thing only, then how can I sleep and how can I get happiness?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥