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mahabharat 10.4.1: कृपाचार्य बोले, "महाराज, आप अपनी बात से टस से मस नहीं होंगे। यह सौभाग्य की बात है कि आपके अंदर बदला लेने की प्रबल इच्छा है। वज्रधारी इंद्र भी आपको ऐसा करने से नहीं रोक सकते।"   |   mahabharat अध्याय 10.4: कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 4: कृपाचार्यका कल प्रात:काल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.4.1 
कृप उवाच
दिष्ट्या ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत।
न त्वां वारयितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वयम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
कृपाचार्य बोले, "महाराज, आप अपनी बात से टस से मस नहीं होंगे। यह सौभाग्य की बात है कि आपके अंदर बदला लेने की प्रबल इच्छा है। वज्रधारी इंद्र भी आपको ऐसा करने से नहीं रोक सकते।"
 
Kripacharya said, "Sir, you are not going to budge from your stand. It is fortunate that you have a strong desire to take revenge. Even Indra, the one wielding the thunderbolt, cannot stop you from doing this."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)