श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 3: अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  10.3.9-10 
यथा हि वैद्य: कुशलो ज्ञात्वा व्याधिं यथाविधि।
भैषज्यं कुरुते योगात् प्रशमार्थमिति प्रभो॥ ९॥
एवं कार्यस्य योगार्थं बुद्धिं कुर्वन्ति मानवा:।
प्रज्ञया हि स्वया युक्तास्तां च निन्दन्ति मानवा:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! जैसे कुशल चिकित्सक रोग को भली-भाँति जानकर उसके निवारण के लिए औषधि बताता है, वैसे ही मनुष्य किसी कार्य की सफलता के लिए विवेक से विचार करके निश्चयात्मक बुद्धि अपनाता है; किन्तु दूसरे लोग उसकी निन्दा करने लगते हैं॥9-10॥
 
‘Prabhu! Just as a skilled doctor, after knowing the disease in a proper manner, prescribes medicine for its cure, similarly, for the success of a task, a man, after thinking with his discretion, adopts a decisive intellect; but other people start criticizing him.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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