श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 3: अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  10.3.5 
सर्वस्य हि स्वका प्रज्ञा साधुवादे प्रतिष्ठिता।
परबुद्धिं च निन्दन्ति स्वां प्रशंसन्ति चासकृत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सबकी दृष्टि में अपनी ही बुद्धि ऊँचे स्थान पर, धन्यवाद के योग्य प्रतीत होती है। सब लोग दूसरों की बुद्धि की निन्दा करते हैं और अपनी ही बुद्धि की बार-बार प्रशंसा करते हैं।॥5॥
 
‘In everybody's eyes, one's own intelligence seems to be placed on a high pedestal, worthy of being thanked. Everyone criticises the intelligence of others and repeatedly praises their own intelligence.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)