श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 3: अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  10.3.4 
सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं बुद्धिमत्तरम्।
सर्वस्यात्मा बहुमत: सर्वात्मानं प्रशंसति॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हर कोई अपने आप को बहुत बुद्धिमान समझता है। हर कोई अपनी बुद्धि को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता है और हर कोई अपनी बुद्धि की तारीफ़ करता है।
 
‘Everyone considers himself to be very intelligent. Everyone considers his own intelligence to be more important and everyone praises his own intelligence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)