श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 3: अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.3.16 
सर्वे हि बुद्धिमाज्ञाय प्रज्ञां वापि स्वकां नरा:।
चेष्टन्ते विविधां चेष्टां हितमित्येव जानते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि या विवेक का आश्रय लेकर नाना प्रकार के प्रयत्न करता है और उन्हें अपने लिए लाभदायक समझता है।॥16॥
 
‘Everyone takes recourse to his own intelligence or discretion and makes various efforts and considers them to be beneficial for himself.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)