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श्लोक 10.3.1  |
संजय उवाच
कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम्।
अश्वत्थामा महाराज दु:खशोकसमन्वित:॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| संजय कहते हैं- महाराज! कृपाचार्य के वचन धर्म और अर्थ से परिपूर्ण तथा मंगलमय थे। उन्हें सुनकर अश्वत्थामा शोक और शोक में डूब गया॥1॥ |
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| Sanjaya says- Maharaj! Kripacharya's words were full of Dharma and meaning and were auspicious. On hearing them Ashwatthama was drowned in sorrow and grief.॥1॥ |
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