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mahabharat 10.2.34-35: किसी कार्य को आरम्भ न करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता; किन्तु जिनका कार्य प्रयत्न करने पर भी सिद्ध नहीं होता, वे अवश्य ही भगवान् द्वारा शापित होते हैं। इस विषय में अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए ॥ 34-35॥   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  10.2.34-35 
अनारम्भात् तु कार्याणां नार्थ: सम्पद्यते क्वचित्॥ ३४॥
कृते पुरुषकारे तु येषां कार्यं न सिद्धॺति।
दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
किसी कार्य को आरम्भ न करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता; किन्तु जिनका कार्य प्रयत्न करने पर भी सिद्ध नहीं होता, वे अवश्य ही भगवान् द्वारा शापित होते हैं। इस विषय में अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए ॥ 34-35॥
 
No purpose is achieved by not starting a task; but those whose work is not accomplished even after making efforts are definitely cursed by God. One should not think otherwise in this matter. ॥ 34-35॥
 
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृपसंवादे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवादविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)