श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  10.2.33-34h 
ते पृष्टास्तु वदेयुर्यच्छ्रेयो न: समनन्तरम्॥ ३३॥
तदस्माभि: पुन: कार्यमिति मे नैष्ठिकी मति:।
 
 
अनुवाद
अब वे हमारे पूछने पर जो कुछ उत्तम कार्य-विधि बताएँ, वही हमें करना चाहिए; यह मेरे मन का दृढ़ निश्चय है ॥33 1/2॥
 
Now whatever they tell us about the best course of action on our asking, that is what we must do; this is the firm determination of my mind. ॥ 33 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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