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mahabharat 10.2.30-31h: जब मनुष्य आसक्ति के प्रभाव से अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ हो जाए, तब उसे अपने मित्रों से परामर्श लेना चाहिए। वहीं उसे ज्ञान और विनम्रता प्राप्त हो सकती है और वहीं उसे अपने कल्याण का उपाय दिखाई दे सकता है।   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  10.2.30-31h 
मुह्यता तु मनुष्येण प्रष्टव्या: सुहृदो जना:॥ ३०॥
तत्रास्य बुद्धिर्विनयस्तत्र श्रेयश्च पश्यति।
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य आसक्ति के प्रभाव से अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ हो जाए, तब उसे अपने मित्रों से परामर्श लेना चाहिए। वहीं उसे ज्ञान और विनम्रता प्राप्त हो सकती है और वहीं उसे अपने कल्याण का उपाय दिखाई दे सकता है।
 
When a man is incapable of deciding what is good or bad due to the influence of attachment, then he should take advice from his friends. There he can attain wisdom and humility and there he can see the means of his welfare. 30 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)