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mahabharat 10.2.29-30h: इस संकट से पूरी तरह व्यथित होने के कारण, बहुत सोचने-विचारने के बाद भी मेरा मन मेरे लिए हितकर कोई भी कार्य करने का निर्णय नहीं ले पा रहा है।   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  10.2.29-30h 
अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता॥ २९॥
बुद्धिश्चिन्तयते किंचित् स्वं श्रेयो नावबुद्धॺते।
 
 
अनुवाद
इस संकट से पूरी तरह व्यथित होने के कारण, बहुत सोचने-विचारने के बाद भी मेरा मन मेरे लिए हितकर कोई भी कार्य करने का निर्णय नहीं ले पा रहा है।
 
Being totally distressed by this crisis, even after much thinking and contemplation, my mind is unable to decide on any action that is beneficial for me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)