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श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  10.2.28-29h 
अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम्॥ २८॥
अस्मानप्यनयस्तस्मात् प्राप्तोऽयं दारुणो महान्।
 
 
अनुवाद
क्योंकि हमने उस पापी का अनुसरण किया, इसलिए हमें भी यह भयंकर विपत्ति झेलनी पड़ी है।
 
Because we followed that sinner, we too have suffered this terrible calamity. 28 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)