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mahabharat 10.2.27-28h: पहले भी उसका स्वभाव बहुत दुष्ट था। वह धैर्य रखना नहीं जानता था। वह अपने मित्रों की बात नहीं सुनता था; इसीलिए अब जब उसका काम बिगड़ जाता है, तो उसे पश्चाताप होता है।   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  10.2.27-28h 
पूर्वमप्यतिदु:शीलो न धैर्यं कर्तुमर्हति॥ २७॥
तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वच:।
 
 
अनुवाद
पहले भी उसका स्वभाव बहुत दुष्ट था। वह धैर्य रखना नहीं जानता था। वह अपने मित्रों की बात नहीं सुनता था; इसीलिए अब जब उसका काम बिगड़ जाता है, तो उसे पश्चाताप होता है।
 
Earlier also he had a very wicked nature. He did not know how to be patient. He did not listen to his friends; that is why now he repents after his work has gone wrong.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)