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mahabharat 10.2.20-21h: बिना प्रयास के यहाँ कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जो योग्य एवं उदार मनुष्य ईश्वर को सिर झुकाकर सभी कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है, वह असफलताओं का शिकार नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  10.2.20-21h 
हीनं पुरुषकारेण कर्म त्विह न सिद्धॺति।
दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान् सम्यगीहते॥ २०॥
दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघैर्विहन्यते।
 
 
अनुवाद
बिना प्रयास के यहाँ कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जो योग्य एवं उदार मनुष्य ईश्वर को सिर झुकाकर सभी कार्यों को पूर्ण करने का प्रयत्न करता है, वह असफलताओं का शिकार नहीं होता।
 
Without effort no work can be accomplished here. The capable and generous man who bows his head to God and tries his best to accomplish all the tasks does not fall prey to failures. 20 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)