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mahabharat 10.2.15: परिश्रम में लगा हुआ योग्य व्यक्ति सुखी जीवन जी सकता है; किन्तु आलसी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। इस संसार में प्रायः परिश्रम करने वाले ही अपना स्वार्थ सिद्ध करते देखे जाते हैं॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.2.15 
शक्नोति जीवितुं दक्षो नालस: सुखमेधते।
दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन् दक्षा: प्रायो हितैषिण:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
परिश्रम में लगा हुआ योग्य व्यक्ति सुखी जीवन जी सकता है; किन्तु आलसी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। इस संसार में प्रायः परिश्रम करने वाले ही अपना स्वार्थ सिद्ध करते देखे जाते हैं॥ 15॥
 
A capable person engaged in hard work can live a happy life; but a lazy person is never happy. In this world, usually only those who work diligently are seen achieving their own interests.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)