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mahabharat 10.2.13: सामान्यतः इस पृथ्वी पर किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं देखा जाता; परंतु कर्म न करने से दुःख ही देखा जाता है; अतः कर्म को बहुत ही फलदायी समझना चाहिए॥13॥   |   mahabharat अध्याय 10.2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.2.13 
प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि।
अकृत्वा च पुनर्दु:खं कर्म पश्येन्महाफलम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
सामान्यतः इस पृथ्वी पर किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं देखा जाता; परंतु कर्म न करने से दुःख ही देखा जाता है; अतः कर्म को बहुत ही फलदायी समझना चाहिए॥13॥
 
Generally, the work done on this earth is never seen to be fruitless; but by not doing work, only suffering is seen; hence work should be considered to be very fruitful.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)