श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 2: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.2.1 
कृप उवाच
श्रुतं ते वचनं सर्वं यद् यदुक्तं त्वया विभो।
ममापि तु वच: किंचिच्छृणुष्वाद्य महाभुज॥ १॥
 
 
अनुवाद
तब कृपाचार्य बोले- हे महाबाहो! मैंने आपकी सारी बातें सुन लीं। अब मेरी भी बात सुनिए।॥1॥
 
Then Krupacharya said- O powerful Mahabaho! I have heard everything you have said. Now listen to me too.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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