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mahabharat 10.18.7: भरतनंदन! वष्टकार उस धनुष की डोरी थी। यज्ञ, स्नान, दान, होम और जप ये चारों अंग भगवान शिव के लिए कवच बन गए। 7॥   |   mahabharat अध्याय 10.18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  10.18.7 
वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत।
यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य संनहनेऽभवन्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! वष्टकार उस धनुष की डोरी थी। यज्ञ, स्नान, दान, होम और जप ये चारों अंग भगवान शिव के लिए कवच बन गए। 7॥
 
Bharatnandan! Vashtakar was the string of that bow. The four parts of the Yagya, bath, charity, home and chanting became the armor for Lord Shiva. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)