श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 18: महादेवजीके कोपसे देवता, यज्ञ और जगत‍्की दुरवस्था तथा उनके प्रसादसे सबका स्वस्थ होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.18.17 
प्राद्रवन्त ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वश:।
केचित् तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् समस्त देवतागण तथा यज्ञ के समस्त अंग वहाँ से भाग गए, और कुछ वहाँ भटकते हुए प्राणहीन हो गए ॥17॥
 
Thereafter all the deities and all the parts of the Yagya fled from there. Some became lifeless while wandering there. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)