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mahabharat 10.16.31-32: हमारे राज्य को लूटने वाला पापी दुर्योधन मारा गया है और मैंने तड़पते हुए दुःशासन का रक्त पी लिया है। शत्रुता का पूर्ण बदला ले लिया गया है। अब जो लोग कुछ कहना चाहते हैं, वे हमारी निन्दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को केवल इसलिए परास्त करके जीवित छोड़ दिया है, क्योंकि वह ब्राह्मण और गुरुपुत्र था॥ 31-32॥   |   mahabharat अध्याय 10.16: श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  10.16.31-32 
हतो दुर्योधन: पापो राज्यस्य परिपन्थिक:।
दु:शासनस्य रुधिरं पीतं विस्फुरतो मया॥ ३१॥
वैरस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम्।
जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् गौरवेण च॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हमारे राज्य को लूटने वाला पापी दुर्योधन मारा गया है और मैंने तड़पते हुए दुःशासन का रक्त पी लिया है। शत्रुता का पूर्ण बदला ले लिया गया है। अब जो लोग कुछ कहना चाहते हैं, वे हमारी निन्दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को केवल इसलिए परास्त करके जीवित छोड़ दिया है, क्योंकि वह ब्राह्मण और गुरुपुत्र था॥ 31-32॥
 
'The sinner Duryodhan, the plunderer of our kingdom, has been killed and I have drunk the blood of the writhing Dushasan. The enmity has been fully avenged. Now those who wish to say something cannot criticize us. We have defeated Drona's son Ashwatthama and left him alive only because he was a Brahmin and a Guru's son.॥ 31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)