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श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  10.15.8 
अचीर्णब्रह्मचर्यो य: सृष्ट्वा वर्तयते पुन:।
तदस्त्रं सानुबन्धस्य मूर्धानं तस्य कृन्तति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति जिसने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है, एक बार प्रयोग करने के बाद उसे वापस करने का प्रयास करता है, तो वह अस्त्र उसके बन्धुओं सहित उसके सिर को काट देता है।
 
If a man who has not observed celibacy, after using it once, tries to return it, that weapon would cut off his head along with his relatives. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)