श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  10.15.35 
वैशम्पायन उवाच
तत: परमम स् त्रं तु द्रौणिरुद्यतमाहवे।
द्वैपायनवच: श्रुत्वा गर्भेषु प्रमुमोच ह॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: हे राजन! व्यासजी के ये वचन सुनकर द्रोणपुत्र ने युद्ध में उठाया हुआ दिव्यास्त्र पाण्डवों के गर्भ पर छोड़ा।
 
Vaishmpayana says: O King! On hearing these words of Vyasa, Drona's son released the divine weapon, which he had raised in the war, on the wombs of the Pandavas.
 
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि ब्रह्मशिरोऽस्त्रस्य पाण्डवेयगर्भप्रवेशने पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें ब्रह्मास्त्रका पाण्डवोंके गर्भमें प्रवेशविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)