श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.15.22 
एवं धृतिमत: साधो: सर्वा स् त्रविदुष: सत:।
सभ्रातृबन्धो: कस्मात् त्वं वधमस्य चिकीर्षसि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
वह इतना धैर्यवान, मुनि, समस्त अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता और उत्तम पुरुष है, फिर भी तुम उसे उसके भाइयों सहित क्यों मारना चाहते हो? 22॥
 
He is such a patient, sage, knowledgeable of all weapons and a good man, yet why do you wish to kill him along with his brothers? 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)