श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  10.15.2-3 
उवाच भरतश्रेष्ठ तावृषी प्राञ्जलिस्तदा।
प्रमुक्तमस्त्रमस्त्रेण शाम्यतामिति वै मया॥ २॥
संहृते परमास्त्रेऽस्मिन् सर्वानस्मानशेषत:।
पापकर्मा ध्रुवं द्रौणि: प्रधक्ष्यत्यस्त्रतेजसा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! उस समय उन्होंने हाथ जोड़कर उन दोनों ऋषियों से कहा - 'हे ऋषियों! मैंने यह अस्त्र केवल इसी उद्देश्य से छोड़ा था कि इससे शत्रुओं द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र शांत हो जाए। अब पापी अश्वत्थामा इस उत्तम अस्त्र को वापस लेकर अपने अस्त्र के तेज से हम सबका अवश्य ही विनाश कर देगा।॥ 2-3॥
 
O best of the Bharatas! At that time he folded his hands and said to those two sages - 'O sages! I had released this weapon with the sole purpose that the Brahmastra released by the enemy should be silenced by it. Now, after taking back this excellent weapon, the sinful Ashwatthama will surely destroy us all with the brilliance of his weapon.॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)