श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 15: वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोंपर दिव्यास्त्र छोड़ना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.15.16 
विसृष्टं हि मया दिव्यमेतदस्त्रं दुरासदम्।
अपाण्डवायेति मुने वह्नितेजोऽनुमन्त्र्य वै॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मुने ! मैंने अग्नि के समान तेज से युक्त इस दुर्जय दिव्यास्त्र को पाण्डवों का नामोनिशान मिटा देने के उद्देश्य से ही छोड़ा था ॥16॥
 
'Mune! I had released this formidable divine weapon, imbued with the brilliance of fire, with the sole purpose of destroying all traces of the Pandavas. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)