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mahabharat 10.12.17: “ब्राह्मण! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और सर्प- ये सब मिलकर भी मेरे पराक्रम के सौवें भाग के बराबर भी नहीं हो सकते ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 10.12: श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 12: श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.12.17 
देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगा:।
न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिता:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
“ब्राह्मण! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और सर्प- ये सब मिलकर भी मेरे पराक्रम के सौवें भाग के बराबर भी नहीं हो सकते ॥17॥
 
“Brahmin! Gods, demons, Gandharvas, humans, birds and snakes – all of them together cannot match even a hundredth part of my might. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)