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mahabharat 10.11.31-d1h: हे भरतपुत्र! भीमसेन शिविर से बाहर आकर अश्वत्थामा के रथ का चिह्न देखकर, जो अपने स्थान से हिलने को तैयार नहीं थे, शीघ्रतापूर्वक उसी मार्ग पर आगे बढ़े, जिस मार्ग से द्रोणपुत्र अश्वत्थामा गया था।   |   mahabharat अध्याय 10.11: युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 11: युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 31-d1h
 
 
श्लोक  10.11.31-d1h 
शिबिरात् स्वाद् गृहीत्वा स रथस्य पदमच्युत:॥ ३१॥
(द्रोणपुत्रगतेनाशु ययौ मार्गेण भारत।)
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! भीमसेन शिविर से बाहर आकर अश्वत्थामा के रथ का चिह्न देखकर, जो अपने स्थान से हिलने को तैयार नहीं थे, शीघ्रतापूर्वक उसी मार्ग पर आगे बढ़े, जिस मार्ग से द्रोणपुत्र अश्वत्थामा गया था।
 
O son of Bharata! Coming out of the camp, Bhimasena, who was not willing to budge from his stand, seeing the signs of Ashwatthama's chariot, hurriedly advanced on the same route by which Drona's son Ashwatthama had gone.
 
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौणिवधार्थं भीमसेनगमने एकादशोऽध्याय:॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अश्वत्थामाके वधके लिये भीमसेनका प्रस्थानविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३१ १/२ श्लोक हैं।)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)