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mahabharat 10.11.1: वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! युद्ध में अपने पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को मारा गया देखकर राजा युधिष्ठिर का हृदय महान शोक से भर गया॥1॥   |   mahabharat अध्याय 10.11: युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 11: युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.11.1 
वैशम्पायन उवाच
स दृष्ट्वा निहतान् संख्ये पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा।
महादु:खपरीतात्मा बभूव जनमेजय॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! युद्ध में अपने पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को मारा गया देखकर राजा युधिष्ठिर का हृदय महान शोक से भर गया॥1॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! On seeing his sons, grandsons and friends killed in the war, King Yudhishthira's heart was filled with great sorrow. ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)