श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  10.1.52-53h 
अस्मिन्नर्थे पुरा गीता श्रूयन्ते धर्मचिन्तकै:॥ ५२॥
श्लोका न्यायमवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थास्तत्त्वदर्शिभि:।
 
 
अनुवाद
इस विषय में प्राचीन काल में धर्मज्ञों और न्यायप्रिय लोगों ने ऐसे श्लोक गाये हैं, जो सारभूत अर्थ बताते हैं। वे श्लोक इस प्रकार कहे जाते हैं -॥52 1/2॥
 
‘In this matter, the religious thinkers and the people with a view to justice have sung such verses in ancient times, which explain the essential meaning. Those verses are recited in this manner -॥ 52 1/2॥
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