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mahabharat 10.1.47-48: यहाँ मैंने राजा दुर्योधन से पाण्डवों का वध करने की प्रतिज्ञा की है। किन्तु यह कार्य पतंगे के आग में कूदने के समान है। जिस मनोवृत्ति से मैंने उपरोक्त प्रतिज्ञा की है, वह मुझे नष्ट कर देगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायपूर्वक युद्ध करूँगा, तो मुझे अपने प्राण त्यागने पड़ेंगे ॥47-48॥   |   mahabharat अध्याय 10.1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  10.1.47-48 
राज्ञ: सकाशात् तेषां तु प्रतिज्ञातो वधो मया॥ ४७॥
पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्थायात्मविनाशिनीम्।
न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशय:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
यहाँ मैंने राजा दुर्योधन से पाण्डवों का वध करने की प्रतिज्ञा की है। किन्तु यह कार्य पतंगे के आग में कूदने के समान है। जिस मनोवृत्ति से मैंने उपरोक्त प्रतिज्ञा की है, वह मुझे नष्ट कर देगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायपूर्वक युद्ध करूँगा, तो मुझे अपने प्राण त्यागने पड़ेंगे ॥47-48॥
 
Here I have made a vow to King Duryodhana to kill the Pandavas. But this act is like a moth jumping into a fire. The attitude with which I have made the above vow will destroy me. There is no doubt that if I fight according to justice, I will have to give up my life. ॥ 47-48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)