श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  10.1.43-44h 
तांस्तु हत्वा तत: काकान् कौशिको मुदितोऽभवत्॥ ४३॥
प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदन:।
 
 
अनुवाद
शत्रुओं का संहार करने वाला वह उल्लू उन कौओं को मारकर और अपनी इच्छानुसार शत्रुओं से पूरा बदला लेकर बहुत प्रसन्न हुआ॥43 1/2॥
 
That owl, the slayer of enemies, was very happy after having killed those crows and having taken full revenge from his enemies as per his wish. ॥ 43 1/2 ॥
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