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श्री महाभारत
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पर्व 10: सौप्तिक पर्व
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अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना
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श्लोक 39
श्लोक
10.1.39
सोऽथ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डज:।
न्यग्रोधस्य तत: शाखां प्रार्थयामास भारत॥ ३९॥
अनुवाद
हे भरतनन्दन! वह पक्षी धीरे-धीरे बोलता हुआ मानो छिपकर वटवृक्ष की उस शाखा के पास आने की इच्छा करने लगा।
O Bharatanandan! That bird speaking softly, as if hiding, began to desire to come to that branch of the banyan tree. 39.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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